Friday, 28 June 2013

अगले द्रश्य में :

अगर ये शहर है तो क्या हुआ जंगल में भी ऐसा होता है ,

जहाँ किसी आदिवासी लड़के को देखकर अर्धनग्न आदिवासी औरतों का हुजूम उसके पीछे पड़ जाता है,वो बेचारा अपनी जान बचाने के लिए भागता है ,समुन्दर में जाता है ,पेड़ पर चढ़ता है, 

पर कुछ लड़कियां मिलकर उसका अपहरण कर लेती हैं और फिर झाड़ियों के पीछे ले जाकर उसके साथ.......क्या करती हैं

(आगे आप खुद समझदार हैं)



द्रश्य २ : 

एक पुरुष फिल्मस्टार को देखकर औरतें पगला जाती है और उसको छूने की बेताबी में उसको पूरा झंझोड़ देती हैं,

बेचारे के कपड़ो की धज्जियाँ उड़ा दी जाती है,

वो किसी तरह अपनी जान बचा कर भागता है.





कथावस्तु 

इस फिल्म की कोई मुख्य कथावस्तु नहीं है.

इसका उद्देश्य सिर्फ SHOCKING क्रिया कलापों को दुनिया को दिखाना था.

जैसे की फिल्म की शुरुआत में ही NUMBERING में ही एक मासूम कुत्ते को जबरदस्ती जंगली कुत्तों से भरे बाड़े में फेंक कर होता है,जहाँ वो कुत्ते उसको फाड़ डालते हैं.

(उस बाड़े में कैमरा ना जाने के कारन ये द्रश्य फिल्मा नहीं पाते)


इस फिल्म के निर्माण का मुख्य उद्देश्य था ,पूरी दुनिया में घूम घूम कर उन हैरतंगेज सच को दुनिया के सामने रखना,जिसे देखकर लोग SHOCK हो जाएँ,

इसलिए इसे "SHOCKUMENTRY " कहा गया.

ये हमे दुनिया के उन स्थानों में ले गयी,जहाँ आज तक कभी कैमरा पहुंचा ही नहीं था.

ये एक इतालियन फिल्म है ,जिसका निर्माण १९६२ मे Italian filmmakers Paolo Cavara, Franco Prosperi, और Gualtiero Jacopetti द्वारा किया गया था.

इसे इंग्लिश में "A DOG 'S WORLD " के नाम से भी रिलीज़ किया गया.
MONDO CANE 


दोस्तों,

आज पेश है एक ऐसी फिल्म जिसने  विश्व सिनेमा को सिनेमा की एक नयी विधा दी....

"SHOCKUMENTRY "


तो पेश है आज की BANNED फिल्म...

Wednesday, 26 June 2013

इस फिल्म को YOUTUBE द्वारा यहाँ से देखा जा सकता है 




इस फिल्म के ब्रितानी टेलीविसन पे प्रसारित होने के बाद 

इतनी तीखी प्रतिक्रियाए मिली की सोनिया को अपना फेसबुक 

एकाउंट हटा देना पड़ा.


कई सवाल उठने चाहिए थे जिनके जवाब फिल्म मे नहीं 
मिलते. 

जैसे की कैसे एक सीख जनरल की अगुवाई मे पूरी सेना 
गुरुद्वारे मे टेंक समेत दाखिल हो गयी?

किस वजह से भिंडरावाले के फोलोअर इतने ज्यादा थे और 
आज भी है इत्यादि.


इस फिल्म मे जो भी बयान और विचार थे वो व्यक्ति गत थे 

सोनिया देओल के. वो भी हादसे के २५ साल बाद जब कि  

वो तो इस हादसे से किसी भी तरह से जुडी भी नहीं थी.


इस फिल्म को बनाने वाली सोनिया देओल ने खुद इस फिल्म 
मे कहा है कि  वो अभी अभी अपने भाग्य और धर्म को 
समझने लगी है. स्वर्ण मंदिर के दर्शन के बाद मे.
विवाद


पहला विवाद सीख समुदाय द्वारा उठा. सिख  समुदाय 

भिंडरावाले  को एक संत मानता है, जब की इस फिल्म से 

उनकी छवि एक आतंकवादी के रूप मे उभर कर आती है.



इस फिल्म पर निसंदेह भारतीय सरकार की भी भौहे तनी थी. 

क्यों की इस फिल्म मे बताया गया था की भारत मे इंदिरा 

गाँधी जी की हत्या के बाद किस तरह की प्रतिक्रिया और 

हिंसा हुई थी. 


जिस से भारतीय राजनीति की छवि धूमिल  हो 

सकती है.
हरविंदर सिंह  फुलका एक वकील है जो उन दंगो मे गयी जान की याद मे आज भी पूरे देल्ही मे २५००० पेड लगवाना चाहते है. ताकि उन लोगो की याद रहे आज से १०० साल बाद भी इन पेडो की शक्ल मे.


सोनिया एक न्यूज़ फोटोग्राफर से मिलती है

जो बहुत खुश है की उसने एक इंसान की जान बचाई थी उन दंगो मे.


ब्रिटेन मे भी जम कर इस ऑपरेशन का विरोध हुआ था १९८४ मे.

आखिर इंदिरा गांधीजी के गार्ड ने (B K SINGH -  जो की एक सिख था.) अपने साथी सतवंत सिंह  के साथ मिलकर इंदिरा गांधी की हत्या कर दी.


इंदिरा गाँधी जी की मौत के बाद हिन्दुस्ता मे जो दंगे भडके है, उन्हें आज कोई याद नहीं करना चाहता. 

उसी की कुछ कहानिया इस फिल्म मे है जिनकी चर्चा मैं भी यहाँ पर नहीं करना चाहता, ना कही और करना चाहूँगा.




सोनिया आम जनता का मत जानने की कोशिश करती है. तो पाती है की आज के सिख  यूथ के लिए आज भी भिंडरावाला  एक आइकोन है. 
एक सैनिक है 
एक संत है 
एक शेर है.







सोनिया पूछती है कि  इतने धार्मिक स्थान पर ये हादसा होना कितना सही था.

बरार  कहते है कि  उन्हें नहीं लगता कि  वो जगह एक धार्मिक  स्थल रहा गयी थी. 

क्योंकि उसके अंदर हथियार बंद हत्यारे रह रहे थे. बंकर बना रहे थे. 

जिन्हें लोग पूज भी रहे थे.


बरार  कहते है कि  उन्हें बोहोत दुःख होता है वो पूरा हादसा याद करके. कई लोगो की जाने गयी थी.

उन्हें दुःख होता है ना सिर्फ बे कसूर लोगो के लिए बल्कि कसूरवारो के लिए भी. क्यों कि आखिर आतंकवादी भी किसी परिवार का हिस्सा थे..


सोनिया पूछती है की जब भक्त अंदर थे, तो अंदर जाने की क्या जरूरत थी?


बरार  समझाते है कि  अगर जल्दी एक्शन ना लिया जाता तो अगले २४ घंटे मे सेना घिर चुकी होती. 

आखिर हम कब तक इस खबर को पूरे  पंजाब मे फैलने से रोके रखते. 

जब पूरे  पंजाब मे ये खबर फैलती कि  स्वर्ण मंदिर पे सेना हमला कर रही है,भिंडरावाले को पकड़ने के लिए तो लाखो की तादाद मे भाले और बन्दूक लेकर सिख समुदाय सेना पे टूट पड़ती. 

सो हमारे पास वक्त नहीं था.


सोनिया जनरल बरार  को मिलने जाती है ताकि सिक्के का दूसरा पहलू पता करने.

बरार  बताते है की कैसे उन्हें मारने की धमकी मिलती रहती है. 

बरार  कहते है की बार बार लाउड स्पीकरो से भक्तो को अपील की गयी थी के वो आतंकवादियों को छोड़ कर मंदिर के बहार आ जाए. 

कई भक्त आये भी थे. जिन्हें ३रे दिन करफियु हटा कर वहा से सुरक्षित निकला भी गया था. 

उनके अनुसार बीच रात की लड़ाई मे पता कर पाना बहुत  मुश्किल था की कौन  आतंकवादी है और कौन आम नागरिक.


हम पर गोलिय चल रही थी. और जवाबी हमले मे कई आतंक वादी मारे गए 

और कुछ आम नागरिक मारे गए.


मगर इस हमले का एक दूसरा पहलू भी था.

जिसमे निर्दोष भक्त जो दर्शन करने आये थे और बे वजह फस गए इस खूनी  खेल मे. 

कई लोगो ने अपने निर्दोष परिवारजानो की जान अपने आँखों के सामने जाते देखी  थी. 

सेना का कहना था की उन्होंने मंदिर मे ऑपरेशन के शुरुआत के पहले भक्तो को मंदिर से निकलने का पूरा मौका  दिया था.

 भक्तो का कहना था की उन्हें कोई सूचना  नहीं मिली थी 

और ना ही कोई मौका.


जनरल बरार  ने भिंडरावाले  की काट ढूंड निकाली. 

उन्होंने वो किया जो  भिंडरावाले ने सोचा नहीं था. 

उन्होंने मंदिर के अंदर टेंक प्रवेश करा दिए. 

जिसका भिंडरावाले के पास कोई जवाब नहीं था.


सरकारी आंकडो के अनुसार करीब १०० जवान और २०० आदमी भिंडरावाले के मारे गए 

इस ऑपरेशन के दौरान. और सेना भिंडरावाले को खत्म करने मे कामियाब हुए.



सेना को एक झटका लगा जब ऑपरेशन के दौरान भिंडरावाले  के आदमी अचानक प्रकट हो कर गोलियाँ बरसा कर सुरंगों और बंकरो के रास्ते गायब हो जाते थे. 

सेना को भनक तक नहीं थी कि  स्वर्ण मंदिर के अंदर बंकरो का निर्माण हो चुका  था. 

सेना पर ग्रेनेड लॉन्चर से तक हमला होने लगा. 

सेना पूरी तरह से गच्चा खा गयी थी अपने दुश्मन को समझने मे. सेना को नहीं पता था कि  भिंडरावाले इतनी अच्छी तरह से तैयार था.


Tuesday, 25 June 2013

आखिर सेना को हुक्म किया गया की सेना आगे बढे.

शहर मे करफियु लगा दिया गया. 

सभी पत्रकारों को शहर से बाहर  कर दिया गया. 

सेना के जवानो को जनरल बरार  के आदेश थे कि  जब तक हुक्म ना मिले कोई गुरुद्वारे पे गोली नहीं चलाएगा.

और ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू हो गया था.


ग्यानी पूरण सिंग उस ऑपरशन के दौरान उसी मंदिर मे थे. 

और अपना पूरा आँखों देखा हाल सोनिया को बताते है.


आखिर १ जून १९८४ के दिन मेजर जनरल बरार को भिंडरावाले  को पकड़ ने की लिए प्लान बनाने को कहा गया.


२ जून १९८४ के दिन एक अंतिम प्रयास किया गया श्रीमती इंदिरा गांधीजी द्वारा.

जिसमे उन्होंने पंजाब की जनता से अपील की थी की खून खराबे की जगह दुश्मनी और नफरत को खत्म किया जाये. 

जिसका कोई नतीजा नहीं निकला.


आगे फिल्म मे यह दर्शाने की कोशिश की गयी है कि  कैसे भिंडरावाले की ताकत बढती गयी.

कैसे वो सिखों  के मसीहा बनते गए. 

कैसे लोग अपने नवजात बच्चों को  भिंडरावाले का आशीर्वाद दिलाने के लिए गुरूद्वारे आते थे.

 कैसे  भिंडरावाले अपने समर्थकों के साथ स्वर्ण मंदिर मे रहने लगा. 

कैसे २ समुदायों के बीच  नफरत की आग फैलती गयी.


अब  भिंडरावाले कोंग्रेस के कंट्रोल से पूरी तरह से बाहर  हो गया था.


सोनिया ने बताया की हिन्दुस्तान की राजनीति  समझ ने के लिए जिस शख्स को अपना गाइड बनाया था वो थे “MARK TULLY” जो की २२ वर्षों से BBC के चीफ CORRESPONDENT थे. 

MARK  के विचार भी उस पूरे  कांड के विषय मे फिल्म मे प्रस्तुत है.

पूरे  १९८४ के उस दर्द नाक हादसे के दौरान  MARK  ब्रितानी हिन्दुस्तानियो के लिए रिपोर्ट भेजा करते थे.


फिल्म मे इस बात का भी वर्णन है कि  कैसे “अकाली दल” का प्रभुत्व १९७७ के दौरान बढ़ रहा था. 

जो की अपने लिए अलग सिख  राज्य (खालिस्तान) की मांग कर रहे थे. 

और इंदिरा गाँधी और उनके पुत्र संजय गांधीजी अकाली दल का प्रभुत्व खत्म करने के लिए अकाली दल का एक विरोधी तैयार करने की कोशिश कर रहे थे. 

जिसमे भिंडरावाले का नाम प्रमुख था.


भिंडरावाला  का जन्म सन १९४७ मे हुआ था जब उस  साल पंजाब दो हिस्सों मे बटा था 

और पंजाब ने खूनी  होली देखी  थी. 

१३ साल की उम्र मे भिंडरावाला ने धार्मिक स्कूल ”तक्साल” मे दाखिला लिया. 

और वही से एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया भिंडरावाला मे. 

तक्साल एक ऐसी जगह है की जहां हो कर ही सिख धर्म गुरु  बनने का रास्ता जाता है.


भिंडरावाला को सिख धर्म से बहुत लगाव था

और वो धार्मिक पढाई मे ध्यान लगते थे. 

इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की सिर्फ ३० साल की उम्र मे वो तक्साल के मुख्य गुरु बन गए.



उस वक्त की भारत की प्रधान मंत्री “इंदिरा गाँधीजी” के हुक्म पर भिंडरावाले  को पकड़ने की मुहिम शुरू हुई थी. 

जिस हुक्म की वजह से श्रंखला बद्ध और किस्से हुए. 

हज़ारो जाने गयी. 

जिनमे से एक जान खुद इंदिरा गांधीजी की भी थी.